क्रांतिकारी भूगोल | अतिवादी भूगोल का वर्णन

✍️क्रांतिकारी भूगोल / अतिवादी भूगोल का विकास

        क्रांतिकारी भूगोल मात्रात्मक क्रान्ति के विरोधाभाव स्वरूप विकसित हुई। यह मार्क्सवादी विचारधारा की प्रयुक्ति है। 1969 में क्लार्क विश्वविद्यालय, मेसाचुसेट्स में Antipode नामक एक भौगोलिक शोध पत्रिका के प्रथम अंक में से क्रांतिकारी भूगोल का जन्म हुआ। इसके विकास में विलियम बुंगी तथा डेविड हार्वे ने परम्परागत पूँजीवादी व्यवस्था को निरर्थक बताते हुए भूगोल को सामाजिक मूल्यों से जोड़ने की अनिवार्यता पर बल दिया। हार्वे ने सन् 1969 में ‘Explaination in Geography‘ में सिद्धान्त निरूपण की क्षमता का आंकलन तथा दिशा निर्देशन किया।

       सन् 1972 में उन्होंने भौगोलिक चिन्तन में इस क्रान्ति को आवश्यक तथा उपयुक्त बताते हुए कहा कि “सामाजिक दशा की निरन्तर बिगड़ती स्थिति तथा उसे नियन्त्रित करने की अक्षमता’ भौगोलिक चिन्तन में क्रान्ति की अनिवार्यता सिद्ध करती है। हार्वे ने अनेक लेखों द्वारा पूँजीवादी सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्द्वन्द्वों तथा विसंगतियों पर प्रहार करते हुए सामाजिक न्याय की अनिवार्यता पर भौगोलिक दृष्टिकोण से व्याख्या की। इनमें ‘Social Justice and Spatial Systems (1972), Revolutionary and Counter Revolutionary Theory in Geography and the Problem of Ghetto Formation (1972), Social Justice and the City (1973) आदि उल्लेखनीय है। ‘घेटो’ (संयुक्त राज्य अमेरिका में नीग्रो लोगों की मलिन बस्तियाँ) के सन्दर्भ में हार्वे ने कहा है कि इनकी सामाजिक दशाओं की परम्परागत ढंग से विवेचना करने की अपेक्षा भूगोलवेत्ताओं को सामाजिक भौगोलिक चिन्तन का एक नया दृष्टिकोण खोजना चाहिए।

✍️क्रांतिकारी भूगोल की पृथक् रूप में विस्तृत विवेचना 

     सर्वप्रथम अमेरिकी भूगोलवेत्ता पीट ने 1973 में अपनी पुस्तक ‘Radicalism in Geography’ में क्रांतिकारी भूगोल की पृथक् रूप में विस्तृत विवेचना की। इसके प्रतिपादन की पृष्ठभूमि पूँजीवादी क्षेत्रीय विज्ञानों तथा मात्रात्मक क्रान्ति के विरोध में तैयार हुई। क्रांतिकारी भूगोलवेत्ताओं का मानना था कि पृथ्वी पर मानव द्वारा मानव का तथा मानव द्वारा पर्यावरण का शोषण किया जा रहा है, जिसके लिए निजी व्यवसायी तथा आर्थिक वर्ग उत्तरदायी हैं। अतः पूँजीवाद का अन्त करके मानव कल्याण की स्थापना की जानी चाहिए। एक वर्ग से दूसरे वर्ग की असमानताओं के विनाश की प्रक्रिया पर बल दिया जाना चाहिए।

✍️क्रांतिकारी भूगोल का संकल्पनात्मक विकास

      क्रांतिकारी भूगोल का संकल्पनात्मक विकास क्रमिक रूप से दो चरणों में हुआ – प्रथम चरण (1969-73) में सामाजिक समस्याओं के भौगोलिक पक्ष का विश्लेषण किया गया, किन्तु विश्लेषण की पृष्ठभूमि सम्प्रति राजनैतिक आर्थिक व्यवस्था में विकसित सिद्धान्त एवं उपागम ही रहे। सन 1972 के उपरान्त पूँजीवादी व्यवस्था से सम्बन्धित सिद्धान्तों एवं उपागमों को चुनौती देते हुए यह स्वीकार किया गया कि सामाजिक उत्पादन के वितरण का प्रश्न सामाजिक उत्पादन की प्रक्रिया से पृथक् करके नहीं देखा जा सकता। इस सन्दर्भ में हार्वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि संयुक्त राज्य अमेरिका को नगरीय मलिन बस्तियों (घेटो) की समस्या का समाधान भूमि उपयोग के नियमन की बाजार प्रतिस्पर्द्धात्मक प्रणाली के उन्मूलन द्वारा ही सम्भव है। इस प्रकार क्रांतिकारी भूगोल के उद्देश्य पूर्ति के लिए एक बिल्कुल पृथक् दार्शनिक एवं सैद्धान्तिक धरातल की खोज होने लगी, जिसके लिए मार्क्स के दर्शन पर आधारित सिद्धान्त प्रतिपादित किये जाने लगे। इस सन्दर्भ में हार्वे ने अपनी पुस्तक The Limit to Capital 1982 में मार्क्स के दर्शन के सन्दर्भ में स्थानिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा ऐतिहासिक उपागमों की विस्तृत चर्चा की है। संक्षेप में, क्रांतिकारी भूगोल जीवन के गुणात्मक स्तर में व्याप्त क्षेत्रीय असमता के भू-वैन्यासिक स्वरूप, संरचनात्मक आधार तथा मौलिक प्रक्रियाओं का अध्ययन करके उसे न्यूनतम करने के दिशा निर्देश देता है। इस दृष्टि से किसी क्षेत्र के भू-वैन्यासिक संगठन को वहाँ रहने वाले लोगों की सामाजिक संरचना से पृथक् रूप में नहीं देखा जाता है। ये तो भू-वैन्यासिक संगठन तथा सामाजिक संरचना के परस्पर अन्तर्सम्बन्ध का स्थानिक अध्ययन मात्र ही न करके इस सम्बन्ध का मानव समाज के कल्याण की दृष्टि से मूल्यांकन करता है।

    क्रांतिकारी भूगोल यद्यपि सामाजिक सिद्धान्तों को समझाने में एक वैकल्पिक आधार अवश्य प्रदान करता है, लेकिन भूगोलशास्त्र स्थानिक विज्ञान के रूप में स्थापित है। स्थानिक विश्लेषण द्वारा प्राप्त प्रतिरूपों का भूगोल में विशेष महत्त्व होता है। क्रांतिकारी भूगोल के समर्थक कभी-कभी कालिक विश्लेषण पर अधिक बल देते हुए इतिहास के निकट पहुँच जाते हैं फिर भी सत्य है कि भूगोल में आयी मात्रात्मक तथा प्रत्यक्षवादी क्रान्ति के कारण सामाजिक आधार के ह्रास पर व्यवहारवाद तथा मानववादी दृष्टिकोण के सदृश्य क्रांतिकारी विचारधारा ने भी नियन्त्रण लगाने का सराहनीय कार्य किया है।

✍️क्रांतिकारी भूगोल का स्वरूप

       भौगोलिक चिन्तन की पूर्ववर्ती प्रवृत्तियों की कटु आलोचना के उपरान्त क्रांतिकारी भूगोलवेत्ता, भूगोल की एक नयी शोध-अग्रभूमि प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं जिसके अन्तर्गत हार्वे के शब्दों में आदर्श वैज्ञानिकतावाद, भौतिकवाद तथा तत्त्ववाद का समन्वयन है। ऐसा समन्वयन सूत्र मार्क्सवाद है। मार्क्स के प्रारम्भिक विचारों का आधार तत्त्वत्वाद था तथा उन्होंने आदर्शोन्मुख वैज्ञानिकतावाद के भौतिक आधार एवं विश्लेषण पद्धति से अंशतः सहमत होते हुए भी उससे आगे बढ़कर पूँजीवादी समाज व्यवस्था का सूक्ष्म परीक्षण करके उसकी विसंगतियों पर प्रकाश डाला। इस विवेचन के आधार पर हार्वे ने बताया कि क्रांतिकारी भूगोल के सिद्धान्तों की जड़ उस वास्तविकता में है जिसका ये स्वरूप निरूपण करते हैं, तथापि द्वन्द्वात्मक विश्लेषण इस तर्क के सहारे अग्रसर होता है कि किसी भी तत्त्व या कार्य में अन्तर्विरोध अन्तर्निहित होता है। ज्योंहि कोई वाद या क्रिया प्रकट होती है उसकी विपरीत प्रतिक्रिया भी सक्रिय जाती है। 

     क्रिया तथा प्रतिक्रिया के अन्तर्द्वन्द्व एवं परस्पर प्रेरणा से ही किसी तत्त्व का विकास होता है अथवा कोई कार्य अग्रसर होता है। अन्ततः दोनों में एक संश्लेषण स्थापित होता है। इस विश्लेषण का ही सहारा लेकर मार्क्स ने राजनीतिक-आर्थिक सामाजिक व्यवस्था का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने पूँजीवाद व्यवस्था में, श्रम द्वारा संसाधनों में मूल्यवृद्धि का पूँजीपति द्वारा क्रमशः अपहरण, इस प्रकार पूँजी संचय एवं उसी उत्तरोत्तर द्वारा क्रमशः अपहरण, इस प्रकार पूँजी संचय, एवं उसी उत्तरोत्तर वृद्धिमान पूँजी संचय से श्रम के शोषण की प्रक्रिया का गहन विवेचन किया। इस विवेचन से उन्होंने पूँजीवाद में अन्तर्निहित अन्तर्विरोधों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि अन्ततोगत्वा इन अन्तर्विरोधों के परिणामस्वरूप इसका नष्ट होना अवश्यम्भावी है। इन अन्तर्विरोधों का संश्लेषण तभी होगा जब साम्यवादी व्यवस्था स्थापित होगी जिसमें संसाधनों पर प्रत्येक नागरिक का समान अधिकार होगा। इस उपागम से ये सिद्धान्त सामाजिक प्रक्रिया के भावी वैकल्पिक स्वरूपों में से चयन कि गुंजायश रखते हुए न सिर्फ सत्य के उद्घाटन का प्रत्युत उसके सृजन का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

✍️ क्रांतिकारी भूगोल की मान्यतायें 

(1). भूगोल को एक समन्वित विज्ञान का अभिन्न अंग माना जाय जिसका परम उद्देश्य एक ऐसी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था का निर्माण हो जिसके अन्तर्गत सम्मिलित सभी व्यक्तियों का संसाधनों पर स्वामित्व एवं नियन्त्रण हो। क्रांतिकारी अथवा मार्क्सवादी भूगोल समन्वित विज्ञान का वह भाग है जो एक ओर सामाजिक प्रक्रियाओं एवं दूसरी ओर प्राकृतिक वातावरण एवं भूवैन्यासिक अन्तर्सम्बन्धों के परस्पर सम्बन्ध का अध्ययन करता है।

(2). द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद एक वास्तविक समाज-विज्ञान हेतु दार्शनिक आधार प्रदान करता है। विज्ञान को बाह्याकृति एवं वास्तविक तत्त्व में विभेद करने में सक्षम होना चाहिए। ऐतहासिक भौतिकवाद अर्थात् भौतिकवाद ( पूँजीसंचय) का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण पूँजीवादी समाज की प्रक्रिया, अन्तर्विरोध तथा विकास दिशा का सही स्वरूप जानने में सहायक है। भूगोल में क्षेत्रीय स्वरूप का अमूर्त ज्यामितिक विश्लेषण (जो वैज्ञानिकतावाद की पद्धति है) क्षेत्र के सामाजिक सत्व (यथार्थ) को समझने में बाधक होता है क्योंकि यह ‘सत्व’ एवं ‘स्वरूप’ के द्वन्द्वात्मक सम्बन्ध को प्रकट नहीं करता। अतएव भूगोलवेत्ता को द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की विश्लेषण विधि अपनानी चाहिये।

(3). सामाजिक प्रक्रियायें जीवन के भौतिक आधार के उत्पादन तथा पुनरुत्पादन पद्धति पर प्रकाश डालती हैं। ये प्रक्रियायें वातावरण विशेष में, जिसके अन्तर्गत प्राकृतिक वातावरण के तत्त्व एवं अन्तक्षेत्रीय विभिन्न प्रकार के सम्बन्ध सम्मिलित हैं, कार्यशील रहती हैं। विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार से ये प्रक्रियायें कार्यशील होती हैं एवं तदनुसार क्षेत्र विशेष की विशेषतायें प्रकट होती हैं। जैसे, उत्पादन की विभिन्न प्रणालियों से विभिन्न प्रकार के भूदृश्य विकसित होते हैं। इस प्रकार सामाजिक प्रक्रियाओं का क्षेत्रीय आयाम भी महत्त्वपूर्ण है। ऐसी मूलतः सामाजिक प्रक्रियाओं को, जिनकी क्षेत्रीय अभिव्यक्ति इतनी प्रबल हो गई है कि वे अति महत्त्वपूर्ण बन गई है, क्षेत्रीय प्रक्रिया कहा जा सकता है। उदाहरण के लिये, पूँजी एवं श्रम का सामाजिक अर्न्तद्वन्द्व का क्षेत्रीय प्रक्षेपण हो जाने से यह विकसित एवं विकासशील देशों के मध्य क्षेत्रीय अन्तर्द्वन्द्व बन गया है। उसी प्रकार, उत्पादन आधिक्य के दोहन का सामाजिक अन्तर्द्वन्द्व, क्रोड एवं उपान्त क्षेत्र के सन्दर्भ में क्षेत्रीय अन्तर्द्वन्द्व में परिणत हो जाता है। इस दृष्टि से क्षेत्रीय प्रक्रिया, सामाजिक प्रक्रिया का ईंधन बन जाती है तथा उसके विकास के स्वरूप एवं गति का रूपान्तरित करने लगती है। अतएव सामान्य सामाजिक प्रक्रिया असंख्य विविध स्थानीय स्वरूपों में प्रकट होती है। इस प्रकार सामाजिक तथा क्षेत्रीय प्रक्रिया के मध्य द्वन्द्वात्मक अन्तर्प्रक्रिया चलती रहती है। क्रान्तिकारी (मार्क्सवादी या समाजवादी भी कह सकते हैं) भूगोलवेत्ता किसी सामाजिक प्रक्रिया से निःसृतत प्रतिक्रियाओं के एक भाग का अध्ययन करते हैं। वे क्षेत्रीय विभिन्नता के प्रति जिज्ञासा मात्र न दर्शाकर क्षेत्रीय असमता’ की समस्या का निराकरण करने को उत्सुक हैं। शैक्षणिक स्तर पर ये भूगोलवेत्ता, विषय का अध्ययन बिन्दु निरर्थक प्रतिरूपों से हटकर ज्वलंत सामाजिक समस्याओं पर केन्द्रित करना चाहते हैं जबकि व्यावहारिक स्तर पर वे ऐसी संगठनात्मक व्यवस्था की खोज में हैं जो सामाजिक परिवर्तन लाने में सक्षम हो।

(4). क्रान्तिकारी भूगोल का एक नया स्रोत ‘अराजकतावादी’ दर्शन है जिसका लक्ष्य एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था प्रस्तुत करना है जिसमें राज्य के उत्पीड़नात्मक सत्ता की आवश्यकता न रह जाय। अराजकतावा; मानव में सहयोग एवं प्रतिस्पर्धा के अनवरत अन्तर्द्वन्द्व के परिणामस्वरूप मानव स्वभाव के विकास का अध्ययन करता है। इनके अनुसार मानव सहस्त्राब्दि से सहयोग पर आधारित जीवनयापन करता रहा है। पूँजीवाद अल्पकालिक प्रतिस्पर्द्धामूलक व्यवस्था का प्रतीक है जिसका स्थायित्व सन्देहास्पद है। अराजकतावाद की अवधारणा से अभिभूत भूगोलवेत्ता उत्पादन के विकेन्द्रित भूवेन्यासिक संगठन के पक्षधर हैं क्योंकि मानव समुदाय अपनी पूरी क्षमता का विकास तभी कर सकता है जब वह विभिन्न प्रकार के आर्थिक कार्यों में संलग्न हो तथा उसका प्राकृतिक वातावरण से घनिष्ठ सम्पर्क बना रहे। ऐसा तभी सम्भव होगा जब उत्पादन छोटी इकाइयों में हो जिसका नियन्त्रण-संचालन लघु मानव समुदाय कर सके।

✍️ क्रांतिकारी भूगोल या समाजवादी का विधितन्त्रात्मक औचित्य 

       विधितन्त्र का तात्पर्य, विश्लेषण की विधि नहीं अपित विषय की सम्पूर्ण विज्ञान के सन्दर्भ में क्या स्थिति एवं महत्त्व है, अर्थात् वास्तविकता के आंकलन में संकल्पनात्मक स्तर पर इसका क्या विशिष्ट स्थान एवं योगदान है, इसकी समीक्षा से है।

    समाजवादी (क्रान्तिकारी) भूगोल के स्वरूप के विवेचन से प्रकट है कि यह सामाजिक संरचना से तथा सामाजिक परिवर्तन की अन्तर्प्रक्रिया (द्वन्द्वात्मक अन्तर्सम्बन्ध अर्थात् परस्पर प्रेरक क्रिया-प्रतिक्रिया) से सम्बन्धित है। लोग (मानव समुदाय विशेष) किस प्रकार सामाजिक सम्बन्धों का सृजन एवं उसमें परिवर्तन करते हैं जिससे भूविन्यास का भी सृजन एवं रूपान्तरण होता है, यही समाजवादी भूगोल का अध्ययन तत्त्व है। इसमें लोगों को सक्रिय कारक के रूप में देखा जाता है। जो विगत काल में सृजित विशिष्ट सामाजिक संरचना एवं व्यवस्था की परिसीमा में रहते हुए भी उसमें परिवर्तन भी करने को सचेष्ट रहते हैं। समाज, जिसके अन्तर्गत समाज विशेष का भूविन्यास भी समाहित है, लोगों द्वारा सृजित होता है और स्वभावतया लोगों द्वारा परिवर्तनीय भी है। इस प्रकार सामाजिक एवं भूवैन्यासिक स्वरूप कालक्रम में विकसित होते हैं। भूविन्यास विशेष का किस प्रकार सृजन-रूपान्तरण हुआ है, इसके लिये विद्यमान स्वरूप का आंकलन भी अनिवार्य हो जाता है। तत्पश्चात्, सामाजिक-ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में उसके क्रमिक विकास पर प्रकाश डाला जाता है जिससे वैकल्पिक (भावी) स्वरूपों का निरूपण सम्भव हो जाता है। आदर्श-वैज्ञानिकतावादी भूगोल में इस सामाजिक ऐतिहासिक गत्यात्मक दृष्टि का सर्वथा अभाव है और उसमें भूविन्यास का सम्बन्धित मानव समुदाय से विलग निरपेक्ष अध्ययन किया जाता है। इस प्रकार, समाजवादी भूगोल, भूवैन्यासिक विश्लेषण को सम्पूर्ण सामाजिक विश्लेषण का एक अंश मात्र मानता है। इसका अभीष्ट है एक समग्र सामाजिक सिद्धान्त प्रस्तुत करना न कि मानव समुदाय निरपेक्ष भूविन्यास के प्रतिरूप की मात्र व्याख्या करना। एसहाईम ने समाजवादी भूगोल जिसका तात्पर्य परम्परागत सामाजिक भूगोल नहीं वरन् क्रान्तिकारी भूगोल है, का विधितन्त्रात्मक औचित्य स्थापित करने के लिये इसका परीक्षण चार दृष्टिकोणों से किया है – (1) विचारों का इतिहास (2) विज्ञान का दर्शन (3) सिद्धान्त का विकास (4) व्यावहारिक परिप्रेक्ष्य।

     प्रथम दृष्टिकोण से समाजवादी भूगोल का परीक्षण करने के पूर्व एसहाईम यह मानकर अग्रसर होते हैं विज्ञान एवं समाज परस्पर गत्यात्मक ढंग से प्रभावित करते हैं अर्थात् एक का प्रभाव दूसरे पर पड़ता है और इस प्रकार दोनों आगे बढ़ने हेतु परस्पर प्रेरित होते हैं।


Read More :-

  1. फ्रेडरिक रेटजेल एक महान मानव भूगोलवेत्ता
  2. हेरोडोटस का भूगोल में योगदान
  3. इरेटोस्थनीज की भूगोल को देन
  4. स्ट्रैबो का भूगोल में योगदान
  5. टॉलेमी का भूगोल में योगदान
  6. हम्बोल्ट का भूगोल के विकास में योगदान
  7. वेबर का औद्योगिक अवस्थान मॉडल 
  8. भूमण्डलीय स्थितीय तंत्र (GPS)
  9. दक्खिनी चित्र शैली 
  10. भारतीय संघीय व्यवस्था के आधारभूत तत्व
  11. मूल कर्त्तव्य और राज्य के नीति निर्देशक तत्व
  12. मूल अधिकार
  13. भारत की संघीय व्यवस्था
  14. भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएं
  15. उद्देशिका | प्रस्तावना


★ हमारे टेलिग्राम ग्रुप से जुड़ने के लिए यहां click करें।

★ हमारे Whatsapp ग्रुप से जुड़ने के लिए यहां click करें।

★ GK Quiz के लिए यहां Click करें।


★ हमारा राजस्थान के महत्वपूर्ण अन्य लेख :-

  1. हमारा राजस्थान – एक परिचय
  2. हमारा राजस्थान के प्राचीन ऐतिहासिक क्षेत्र 
  3. हमारा राजस्थान का इतिहास जानने के सोत 
  4. हमारा राजस्थान ~ प्राचीन सभ्यता स्थल 
  5. हमारा राजस्थान ~ आजादी से पूर्व सरकार का स्वरूप
  6. हमारा राजस्थान का भौतिक स्वरूप
  7. हमारा राजस्थान के जल संसाधन और संरक्षण
  8. हमारा राजस्थान आजीविका के प्रमुख क्षेत्र
  9. हमारा राजस्थान में आधारभूत सेवाएँ
  10. हमारा राजस्थान की लोक संस्कृति एवं कला
  11. 18 वीं सदी का हमारा राजस्थान


>> Categories


GK Quiz के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें।

  1. भारत का भूगोल प्रश्नोत्तरी
  2. भारतीय इतिहास प्रश्नोत्तरी
  3. राजस्थान इतिहास प्रश्नोत्तरी 
  4. हिन्दी प्रश्नोत्तरी
Share this Content ~

Leave a Comment