भारत की संघीय व्यवस्था | Federal System of India

 भारत की संघीय व्यवस्था 

              भारतीय संविधान निर्माताओं ने भारत को राज्यों का संघ ‘ (Union of States) की संज्ञा दी है। भारत के संविधान में कहीं भी संघ (Federation) शब्द का उल्लेख नहीं किया गया है।

हमारे संविधान का निर्माण करते समय संविधान निर्माताओं के सम्मुख भारत शासन अधिनियम,1935 का संघात्मक सरकार का मॉडल था। संविधान निर्माता इस प्रकार की व्यवस्था अपनाना चाहते थे, जो भारतीय परिस्थितियों और जनमानस की प्रकृति के अनुकूल हो। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा में कहा कि जो व्यवस्था हमारे अनुकूल हो वही श्रेष्ठ है।

       संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ . भीमराव अम्बेडकर ने “राज्यों का संघ” वाक्यांश बहुत सोच समझकर रखा था। यह दो तथ्यों को इंगित करता था। प्रथम, भारत की संघीय व्यवस्था संघटक इकाइयों के समझौते के फलस्वरूप निर्मित नहीं की गई, अपितु ब्रिटिश शासन काल के प्रान्तों (Provinces) और देशी रियासतों (Princely States) को मिलाकर बनाया गया था। द्वितीय, भारत के संघ में सम्मिलित राज्य संघ सरकार से पृथक् नहीं हो सकते हैं। 

विषय-सूची

संघीय व्यवस्था का अर्थ ( Meaning of Federal System ):-

          अंग्रेजी के फेडरलिज्म (Federalism) शब्द को लैटिन भाषा के ‘फोइडस’ (Foedus) से लिया गया है, जिसका हिन्दी अनुवाद सन्धि अथवा समझौता है।

        मॉण्टेस्क्यू के अनुसार “संघात्मक सरकार एक ऐसा समझौता है, जिसके द्वारा बहुत से एक जैसे राज्य एक बड़े राज्य के सदस्य बनने को तैयार हो जायें।” 

        गार्नर के अनुसार “संघ एक ऐसी प्रणाली है जिसमें केन्द्रीय तथा स्थानीय सरकारें एक ही प्रभुत्व शक्ति के अधीन होती हैं। ये सरकारें अपने क्षेत्र में, जिसको संविधान या संसद का कोई कानून निश्चित करता है, सर्वोच्च होती हैं।”

        भारतीय संघीय व्यवस्था कनाडा से प्रभावित है। भारत संघ में 28 राज्य तथा 9 केन्द्र शासित प्रदेश हैं। 

भारत की संघीय व्यवस्था प्रणाली अपनाने के कारण:- 

भारत में संविधान निर्माताओं ने एकात्मक शासन के स्थान पर संघात्मक शासन को अपनाया। इसके अनेक कारण हैं :- 

  1. विशाल भौगोलिक क्षेत्र एवं जनसंख्या । 
  2. भूमि, कृषि तथा वन सम्बन्धी प्रान्तीय समस्यायें स्थानीय सरकार ही सफलतापूर्वक हल कर सकती है। 
  3. देश में शान्ति व्यवस्था बनाये रखने के लिये। 
  4. भारत में अनेक रीति रिवाज, प्रथाओं तथा परम्पराओं के कारण 

 भारत की संघीय व्यवस्था की प्रकृति (Nature of Indian Federal System):- 

        भारतीय संघ व्यवस्था विशिष्ट लक्षण लिये हुये है। इसमें कुछ लक्षण संघात्मक व्यवस्था के है तो कुछ एकात्मक शासन व्यवस्था के तथा कुछ अर्द्ध संघ या सौदेबाजी संघ के हैं। भारतीय संघीय व्यवस्था की प्रकृति के विषय में विभिन्न विद्वानों ने भिन्न भिन्न मत व्यक्त किये हैं। 

        प्रो. एलेक्जेण्ड्रोविच के अनुसार “भारत एक सच्चा संघ है तथापि अन्य संघों की भांति इसकी अपनी कुछ निराली विशेषताए हैं, भारत की संघीय व्यवस्था एक अर्द्ध संघ (Quasi Federation) है। 

        नारमन डी पामर “भारतीय गणतन्त्र एक संघ है तथा इसकी अपनी विशेषताएं हैं जिन्होंने संघीय स्वरूप को अपने ढंग से ढाला है। “

         प्रो. पायली – “भारत के संविधान का ढांचा संघात्मक है किन्तु उसकी आत्मा एकात्मक है।”

         के.सी. व्हीयर के अनुसार “ भारत मुख्यतः एकात्मक राज्य है जिसमें संघीय विशेषताएं नाममात्र की हैं । भारत का संविधान संघीय कम है और एकात्मक अधिक है।”

         जी.एन. जोशी के अनुसार – “भारत संघ राज्य नहीं है अपितु अर्द्धसंघ है और इसमें कतिपय एकात्मकता के भी लक्षण हैं। ” 

        डी.डी. बसु का विचार है कि “भारत का संविधान न तो पूर्ण रूप से एकात्मक है और न ही पूर्ण रूप से संघात्मक है वरन दोनों का सम्मिश्रण है । ” 


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भारतीय संघीय व्यवस्था के आधारभूत तत्व | Main Elements Of Indian Federal System


उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि भारत की संघात्मक व्यवस्था के तीन रूप है : 

    1. संघात्मक व्यवस्था 
    2. एकात्मक व्यवस्था 
    3. सहयोगी संघवाद 

(I). संघात्मक व्यवस्था:-  

        भारत के संविधान के संघात्मक लक्षण निम्नांकित हैं :- 

1. संविधान की सर्वोच्चता (Supremacy of the Constitution):- 

 भारत का संविधान देश का सर्वोच्च कानून है। भारत की संसद तथा विधानमण्डल अपनी शक्तियां संविधान से प्राप्त करते हैं। वे कानून जो संविधान के अनुरूप नहीं होते उन्हें सर्वोच्च न्यायालय अवैध घोषित कर सकता है। राष्ट्रपति, राज्यपाल तथा प्रमुख पदाधिकारियों द्वारा संविधान के अनुसार कार्य करने की शपथ ली जाती है।

2. लिखित संविधान (Written Constitution):- 

 लिखित संविधान संघात्मक शासन की प्रमुख शर्त है। इससे संघ तथा राज्यों में मतभेद की संभावना बहुत कम रहती है। इसमें संघ व राज्यों के क्षेत्राधिकार निश्चित होते हैं। अन्य संविधानों की भांति भारत का संविधान एक विस्तृत तथा लिखित संविधान है।

3. कठोर एवं लचीला संविधान (Rigid and Flexible Constitution):-

संघात्मक संविधान प्रायः कठोर होते हैं जिससे उनमें परिवर्तन सरलता से नहीं किये जा सकते हैं। भारत का संविधान अमेरिकी संविधान की तरह कठोर नहीं है। भारत में संविधान संशोधन की प्रक्रिया तथा सामान्य विधि निर्माण में विभिन्नता है। यहां संविधान में संशोधन की विशिष्ट प्रक्रिया अपनाई गई है।

4. शक्तियों का विभाजन (Division of Powers):-

 भारत के संविधान द्वारा महत्वपूर्ण विषय केन्द्र को व स्थानीय महत्त्व के विषय राज्यों को दिए गए हैं। शक्तियों का विभाजन तीन सूचियों के आधार पर किया गया है। 

( i ) संघ सूची (Union List) – संघीय सूची में राष्ट्रीय महत्त्व के 99 विषय सम्मिलित किए गए है। भारत की संसद को प्रतिरक्षा, सशस्त्र सेनायें, अणु शक्ति, विदेशी कार्य, राजनयिक प्रतिनिधित्व, युद्ध व सन्धि, डाक – तार, दूरभाष, संचार, रेल, बन्दरगाह, हवाई मार्ग, सिक्का, टंकण, विदेशी विनिमय, विदेशी ऋण, भारतीय रिजर्व बैंक, नागरिकता व जनगणना आदि विषयों पर कानून बनाने का अधिकार है। 

( II ) राज्य सूची ( State List ) – इसमें 66 विषय हैं। सातवें संविधान संशोधन, 1956 द्वारा सम्पत्ति के अधिग्रहण सम्बन्धी प्रविष्टि राज्य सूची से हटा दी गयी थी तथा 42 वें संशोधन, 1976 द्वारा राज्य सूची के विषय शिक्षा, वन, जंगली जानवर व पक्षियों की रक्षा तथा नाप तौल हटा दिये गये हैं तथा समवर्ती सूची में सम्मिलित कर दिए गए हैं। राज्य सूची के प्रमुख विषय है – पुलिस, न्याय, जेल, स्थानीय स्वशासन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, कृषि, सिंचाई, सड़कें आदि। इन विषयों पर कानून बनाने का अधिकार राज्य विधान मण्डलों को है। इस प्रकार वर्तमान में राज्य सूची के विषयों की संख्या 61 है। 

( III ) समवर्ती सूची ( Concurrent List ) – मूल संविधान में इस सूची में 47 विषय रखे गये थे किन्तु 42 वें संविधान संशोधन द्वारा पांच विषय और जोड़ दिये गये हैं । वर्तमान में समवर्ती सूची के विषयों की संख्या बढ़कर 52 हो गई है । समवर्ती सूची के प्रमुख विषय फौजदारी, विधि और विधि निर्माण की प्रक्रिया, विवाह विच्छेद, कारखाने, श्रमिक संघ, औद्योगिक विवाद, सामाजिक सुरक्षा, सामाजिक बीमा, शिक्षा, जनसंख्या नियन्त्रण और परिवार नियोजन, वन, जंगली जानवर व पशुओं की रक्षा तथा नाप तौल आदि हैं। इस विषय में केन्द्र व राज्य दोनों ही कानून बना सकते हैं। यदि केन्द्र व राज्य दोनों में मतभेद हो तो केन्द्र का कानून मान्य होगा। 

अवशिष्ट शक्तियां ( Residuary Powers ) – अमेरिका, स्विटजरलैण्ड तथा आस्ट्रेलिया में अवशिष्ट शक्तियां राज्यों को प्राप्त हैं परन्तु भारत व कनाडा में अवशिष्ट शक्तियों पर कानून बनाने का अधिकार केन्द्र को प्राप्त है। भारत में कुछ विशेष परिस्थितियों में अनुच्छेद 249, अनुच्छेद 250 तथा अनुच्छेद 252 के अनुसार संसद राज्य सूची के विषय पर कानून बना सकती है ।

5. न्यायपालिका की सर्वोच्चता ( Supremacy of Judiciary ):-

 भारत के संविधान में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष उच्चतम न्यायालय की व्यवस्था की है। सर्वोच्च न्यायालय संविधान की व्याख्या व रक्षा करता है और विधियों की सांविधानिकता की जांच करता है। संघीय शासन व्यवस्था में न्यायपालिका सर्वोच्च होती है तथा वह कार्यपालिका एवं व्यवस्थापिका के प्रभाव से मुक्त रहती है।

6. द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका ( Bi – Cameral Legislature ):-

 संघात्मक शासन व्यवस्था में देश की व्यवस्थापिका के दो सदन होते हैं। भारत में संसद के दो सदन लोकसभा और राज्य सभा है। लोकसभा में जनता को प्रतिनिधित्व दिया गया है जबकि राज्यसभा में राज्यों को। अमेरिका में भी द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका है जिसके प्रतिनिधि सदन (House of Representatives) तथा सीनेट (Senate) दो सदन हैं।

7. भारत की संघीय व्यवस्था में दो प्रकार की सरकारों, कानूनों तथा अधिकारियों का सह-अस्तित्व ( Co – existence of two sets of Government , Laws and Officials ):- 

 प्रो . बाइस के अनुसार संघ राज्य में दो प्रकार की सरकारें होती हैं, केन्द्र में संसद और राज्यों में विधानमंडल । दोनों स्तरों पर पृथक – पृथक कानून बनाने वाली विधायिकाएं हैं। दोनों की कर लगाने की पृथक – पृथक शक्तियां हैं। केन्द्र व राज्य का प्रशासनिक ढांचा और कर्मचारी भी अलग – अलग होते हैं । 

       उपर्युक्त तर्कों के आधार पर कहा जा सकता है कि भारतीय व्यवस्था संघात्मक है। एम.वी. पायली के शब्दों में , ” भारतीय संविधान के संघीय होने पर विवाद उठाने का कोई कारण दृष्टिगत नहीं होता। संविधान संघवाद की कसौटी पर खरा उतरता है। ” 

(II). एकात्मक लक्षण ( Unitary Features ):-

 भारत के संविधान में संघात्मक लक्षणों के साथ – साथ एकात्मक लक्षण भी पाये जाते हैं। भारत के संविधान में एकात्मक लक्षण निम्नांकित हैं :-

1. केन्द्र के पक्ष में शक्तियों का वितरण (Distribution of Powers in favour of Centre):-

 संविधान में शक्तियों का विभाजन केन्द्र के पक्ष में किया गया है। संघ सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केवल संसद को है। राज्य सूची के विषयों पर राज्यों के विधान मण्डल कानून बनाते हैं। समवर्ती सूची के विषयों पर संसद व राज्य विधान मण्डल दोनों कानून बना सकते है किन्तु टकराव होने पर केन्द्र का कानून ही मान्य होगा। अवशिष्ट शक्तियां केन्द्र में निहित की गई है।अत: शक्ति सन्तुलन केन्द्र के पक्ष में झुक गया है। 

2. संघ व राज्यों के लिए एकही संविधान ( Single Constitution for Union and States ):-

अमेरिका व स्वीटजरलैण्ड में संघीय व्यवस्था में केन्द्र व राज्यों के अलग – अलग संविधान है, लेकिन भारत में केन्द्र व राज्यों के लिए एक ही संविधान है।

3. इकहरी नागरिकता (Single Citizenship):-

भारत में दोहरी शासन व्यवस्था होते हुए भी इकहरी नागरिकता है। इसमें संघ तथा राज्यों की कोई पृथक नागरिकता नहीं है। यह व्यवस्था राज्यों की तुलना में केंद्र को शक्तिशाली बनाती है।

4. एकीकृत न्याय व्यवस्था (Integrated Judicial System):-

अमेरिका तथा ऑस्ट्रेलिया में संघ व राज्यों के पृथक पृथक होते हैं किंतु भारत में एक ही सर्वोच्च न्यायालय है। देश के समस्त न्यायालय उच्चतम न्यायालय के अधीन है। उच्चतम न्यायालय के द्वारा दिए गए निर्णय सभी अधीनस्थ न्यायालयों को मान्य होते हैं। 

5. संकटकाल में एकात्मक रूप (Unitary form during Emergency):-

सामान्य परिस्थिति में भारतीय संविधान संघीय आधार पर कार्य करता है किंतु संकटकाल में राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल की घोषणा करने पर राज्यों की स्वायत्तता समाप्त हो जाती है। संविधान के अनुच्छेद 352 के अन्तर्गत युद्ध या बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह, अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत राज्यों में सांविधानिक तंत्र की असफलता, अनुच्छेद 360 के अन्तर्गत वित्तीय आपात के समय संघीय व्यवस्था, एकात्मक रूप ग्रहण कर लेती है । 

6. संसद को राज्यों के पुनर्गठन की शक्ति (Power of the Parliament to Reorganize the States):-

भारत के संविधान के अनुच्छेद 3 के अनुसार संसद को राज्यों के पुनर्गठन का अधिकार है। संसद 

(क) किसी राज्य से उसका कोई प्रदेश पृथक करके दो या दो से अधिक राज्यों को मिलाकर कोई नया राज्य बना दे।(जैसे उत्तराखण्ड, झारखण्ड और छत्तीसगढ़ राज्यों का गठन) 

(ख) किसी राज्य के क्षेत्र में कमी या वृद्धि कर दे। 

(ग) राज्य की सीमाओं तथा उनके नाम बदल दे जैसे बम्बई का मुम्बई, कलकत्ता को कोलकाता, मदास को चेन्नई आदि। 

( घ ) किसी संघ राज्य क्षेत्र का दर्जा बढ़ा कर इसे पूर्ण राज्य का दर्जा दे सकती है, जैसे गोवा। 

7. राज्यसभा में राज्यों का असमान प्रतिनिधित्व (Unequal Representation of States in Council of States):-

अमेरिका में 50 राज्य है तथा प्रत्येक राज्य को सीनेट में दो प्रतिनिधि भेजने का अधिकार है। भारत में राज्यसभा में जनसंख्या के आधार पर राज्यों को प्रतिनिधित्व दिया जाता है, जैसे नागालैण्ड का 1, राजस्थान के 10, बिहार के 16 तथा महाराष्ट्र के 19 प्रतिनिधि हैं। 

8. राष्ट्रपति द्वारा राज्यपालों की नियुक्ति (Appointment of Governors by the President):-

भारत में राज्यपालों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। वे राष्ट्रपति की इच्छा – पर्यन्त अपने पद पर रह सकते हैं । केन्द्र राज्यपाल के माध्यम से राज्य पर नियन्त्रण रखता है । इससे राज्य की स्वायत्तता सीमित हो जाती है।  

9. संविधान संशोधन प्रक्रिया में संघ की सर्वोच्चता (SupremacyoftheUnion In Constitutional Amendment Process):-

संविधान के संशोधन में भी संघीय संसद को राज्य विधान मण्डल की अपेक्षा अधिक शक्तियां प्राप्त हैं। संविधान का अधिकांश भाग संसद के साधारण बहुमत से संशोधित किया जा सकता है, कुछ संशोधनों को संसद के दो – तिहाई बहुमत से पास किया जा सकता है। संविधान के कुछ उपबन्ध है जिन पर राज्यों की स्वीकृति अनिवार्य है। भारत में राज्यों को संविधान में संशोधन का प्रस्ताव रखने का अधिकार नहीं है। 

10. एकल संरचनाएँ (Unitary Structures):-

सम्पूर्ण देश के लिए अखिल भारतीय सेवाओं, इकहरी न्यायपालिका, प्रशासनिक एकरूपता, एक ही नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक, एकल निर्वाचन आयोग आदि की व्यवस्था की गई है जिससे राज्यों की स्वायत्तता प्रभावित होती है। 

11. राज्यों की दुर्बल वित्तीय स्थिति (Weak financial position of the States):-

राज्यों की आय के स्त्रोत बहुत सीमित हैं। ये वित्तीय स्त्रोत राज्यों की लोक-कल्याणकारी सेवाओं और विकास के लिए अपर्याप्त होते हैं। इसलिए राज्य अनुदान व सहायता के लिए केन्द्र पर आश्रित रहते हैं। केन्द्र द्वारा राज्यों को अनुदान शर्तों के आधार पर दिया जाता है। इस प्रकार राज्यों पर केन्द्र का नियन्त्रण रहता है। राज्यों की आर्थिक दुर्बलता और संघ पर उनकी निर्भरता राज्यों की स्वायत्तता को सारहीन बना देती है। 

12. राज्य विधान मण्डलों में प्रस्तुत कतिपय विधेयकों पर राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति (Prior approval of the President for introducing certain bills in State Legislatures):-

कुछ विधेयकों को राज्य विधान सभा में प्रस्तुत करने से पूर्व राष्ट्रपति की अनुमति आवश्यक होती है। उदाहरणार्थ यदि राज्य विधान मण्डल अनुच्छेद 304 ‘ख’ के अन्तर्गत राज्यों के मध्य व्यापार पर सार्वजनिक हित में प्रतिबन्ध लगाना चाहता है तो ऐसे विधेयकों को राज्य विधान मण्डल में प्रस्तुत करने से पूर्व राष्ट्रपति की अनुमति आवश्यक होती है। 

13. अन्तर्राज्यीय व क्षेत्रीय परिषद् (Inter – State Council and Regional Council):-

अनुच्छेद 263 के अनुसार राष्ट्रपति राज्यों के पारस्परिक विवादों की जांच करने, राज्य सूची के विषयों पर सूचना एकत्रित करने, सामान्य नीति – निर्धारण के लिए यदि राष्ट्रपति लोक हित में आवश्यक समझे तो अन्तर्राज्यीय परिषद् की स्थापना कर सकता है। अनुच्छेद 280 के अनुसार वित्त आयोग की स्थापना की जाती है। 

14. केन्द्र के विशेष उत्तरदायित्व (Special responsibilities of the Centre):-

राज्यों की तुलना में केन्द्र को विशेष उत्तरदायित्व प्रदान किये गये हैं। वह अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के उत्थान के लिये योजना बना सकता है तथा उन्हें क्रियान्वित करने के लिए राज्यों को निर्देश दे सकता है।    

   संवैधानिक प्रावधानों के अतिरिक्त योजना आयोग एवं राष्ट्रीय विकास परिषद् जैसी संविधानेत्तर संस्थाओं ने भी केन्द्र को अधिक शक्तिशाली बनाया है, साथ ही प्रधानमंत्री के चमत्कारिक व्यक्तित्व एवं अधिकांशतः केन्द्र व राज्यों में एक दलीय प्रभुत्व ने भी केन्द्र को अधिक सशक्त बनाया है। ग्यारहवें, बारहवें, तेहरवें एवं चौदहवें लोक सभा चुनावों के पश्चात किसी भी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के कारण मिलीजुली सरकारों का गठन हुआ है। इस स्थिति में क्षेत्रीय राजनीतिक दल राष्ट्रीय स्तर पर भी सत्ता में भी भागीदारी निभाते हैं। क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को अपने क्षेत्रीय हितों की पूर्ति हेतु संघ सरकार से सौदेबाजी के अवसर उपलब्ध हुए हैं। इस प्रकार वर्तमान स्थितियों में सौदेबाजी की व्यवस्था को जन्म दिया है। 

(III) सहयोगी संघवाद (Co-operative Federalism):-

         सहयोगी संघवाद में संघ और राज्य सरकारों में सहयोग की भावना व्याप्त रहती है। इसमें प्रतिद्वन्दिता, संघर्ष और दमन के स्थान पर प्रयोग, सहयोग, समन्वय और अनुनय पर बल दिया जाता है। संघीय और क्षेत्रीय दोनों ही सरकारें राष्ट्रीय एवं लोक कल्याणकारी उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए एक दूसरे के सहयोग पर निर्भर करती हैं। 

        सर्वप्रथम ए.एच. विर्च ने अपनी पुस्तक फेडरेलिज्म, फिनांस एण्ड सोशल लेजिसलेशन (Federalism , Finance and Social Legislation) में एक प्रतियोगी तथा सहयोगी संघवाद की संकल्पना का विवेचन किया है और भारत के संघ को सहयोगी संघवाद की संज्ञा दी है। सहयोगी संघवाद से तात्पर्य है कि भारत का संविधान केन्द्र एवं राज्यों के परस्पर सहयोग पर बल देता है। बिर्च के अनुसार इस संकल्पना का मूल आधार संघ सरकार और राज्य सरकार में प्रतियोगी धारणा के साथ – साथ एक दूसरे का सहयोगी बनना है। 

सहयोगी संघवाद के लक्षण (Features of the Co-operative Federalism):- 

        सहयोगी संघवाद के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं : 

  1. सहयोगी संघवाद में संघ और राज्यों के मध्य प्रतिद्वंद्विता के स्थान पर सहयोग, समन्वय और अनुनय पर बल दिया जाता है। 
  2. विशेष परिस्थितियों में संघीय सरकार की स्थिति प्रधान और निर्णायक होती है। 
  3. संघ और राज्यों के वित्तीय स्रोत पृथक – पृथक होते हुए भी, राज्यों की विकासवादी योजनाओं को क्रियान्वित करने के लिए संघीय अनुदानों की व्यवस्था होती है। 
  4. राष्ट्र के समूचे धन का प्रयोग सभी क्षेत्रों के समुचित विकास के लिए किया जाता है। 
  5. संघ और राज्यों के परस्पर विवादों का निपटारा करने के लिए गोष्ठियों, सम्मेलनों, अन्तर-राज्यीय परिषदों और क्षेत्रीय परिषदों का सहारा लिया जाता है। 
  6. विशिष्ट परिस्थितियों में विवादों को निपटाने की शक्ति संघीय सरकार को ही सौंप दी जाती है। 

भारत में सहयोगी संघवाद:- 

सहयोगी संघवाद की संकल्पना भारतीय संविधान निर्माताओं द्वारा प्रदत्त मूल अवधारणा नहीं है लेकिन भारतीय संघात्मक व्यवस्था सहयोगी संघवाद का प्रमुख उदाहरण है। 

संघात्मक व्यवस्था के सन्दर्भ में भारतीय संविधान निर्माताओं का दृष्टिकोण बहुत उदार एवं व्यापक था। उन्होंने अखण्ड सहकारी भारत की कल्पना की थी। उनकी मान्यता थी कि सामाजिक, आर्थिक तथा प्राकृतिक आपदाओं का निवारण सामाजिक और आर्थिक नियोजन तथा परस्पर सहयोग द्वारा हो सकता है।

भारत की राजनीतिक प्रणाली को सहयोगी संघ का स्वरूप प्रदान करने वाली निम्नलिखित संवैधानिक और गैर संवैधानिक संस्थाओं द्वारा सहयोग दिया है :- 

  1. योजना आयोग और राष्ट्रीय विकास परिषद् 
  2. वित्त आयोग 
  3. अन्तर्राज्यीय परिषद्
  4. क्षेत्रीय परिषद्
  5. अखिल भारतीय सेवायें
  6. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग
  7. प्रति वर्ष राज्यपाल सम्मेलन, मुख्यमंत्री सम्मेलन, वित्त मंत्री सम्मेलन, गृह मंत्री सम्मेलन, विधि मंत्री तथा सिंचाई मंत्री सम्मेलन आदि भी सहयोगी संघवाद के सहायक तत्त्व है।

निष्कर्ष:- 

               भारतीय संघवाद की सर्वाधिक उचित व्याख्या यह होगी कि विभिन्न समय में इसके विभिन्न रूप व्यवहार में देखने को मिलते हैं। भारत में एक प्रकार का संघवाद नहीं वरन अनेक प्रकार के संघवाद हैं। एक ही समय में अलग – अलग राज्यों से केन्द्र के भिन्न भिन्न प्रकार के सम्बन्ध रहे हैं। कभी इन सम्बन्धों की व्याख्या सहयोगी संघवाद  के आधार पर तो कभी एकात्मक संघवाद के आधार पर और प्रतियोगी दल व्यवस्था के युग में सौदेबाजी वाली संघ व्यवस्था के रूप में व्याख्या की जाती है। वैसे तो ये तीनों ही प्रवृत्तियां प्रत्येक संघात्मक व्यवस्था में कम या अधिक रूप से एक साथ विद्यमान रहती है, परन्तु कभी – कभी ऐतिहासिक या बाहरी घटनाओं के कारण इनमें से किसी एक की प्रमुखता इसे अन्य दो से अलग श्रेणी की बना देती है। 

               केन्द्र व राज्यों के मध्य सामान्यतः सामंजस्य रहा है । लेकिन जब भी केन्द्र व राज्यों में अलग – अलग दलों की सरकारें गठित हुई है तब केन्द्र तथा राज्यों के बीच तनाव में वृद्धि हुई है। राज्यों द्वारा मांग की गई है कि केन्द्र तथा राज्यों के सहज सम्बन्धों के पुनरीक्षण के लिये आयोग का गठन किया जाये। केन्द्र तथा राज्य के विवादों को सुलझाने के लिये अब तक चार आयोग गठित किये गये हैं – प्रशासनिक सुधार आयोग ( नियुक्ति 1966 , प्रतिवेदन 1970 ), राजमन्नार समिति ( 1970 ), भगवान सहाय आयोग ( 1971 ) तथा सरकारिया आयोग ( नियुक्ति 1983. प्रतिवेदन 1988 ) तथा संविधान समीक्षा आयोग ( 1999 ) 

            भारत की संघीय व्यवस्था की प्रकृति को पूर्णतः संघात्मक, एकात्मक या अर्द्ध-संघात्मक कहना उचित नहीं है। भारत अपने ही प्रकार का एक विचित्र संघ है। यह परम्परागत संघीय व्यवस्था के अनुरूप नहीं है। यह सार्वभौम राज्यों के समझौते का परिणाम नहीं है। इसमें शक्ति सन्तुलन केन्द्र की और झुका हुआ है। संघीय सरकार की शक्तियां विघटनकारी शक्तियों के विरुद्ध संरक्षण है। वे संवैधानिक कुशलता व राजनीतिक स्थिरता प्रदान करती है। संविधानेत्तर कारकों के विकास के कारण भी भारत में संघ ( केन्द्र ) शक्तिशाली हुआ है। साझा सरकारों के युग में राज्यों को केन्द्र से सौदेबाजी करने के अवसर उपलब्ध हुए है। भारतीय संघ को सहयोगी संघवाद की भी संज्ञा दी जाती है। 

          संविधान निर्माताओं ने भारत को राज्यों का संघ ‘ (Union of States) की संज्ञा दी है। अंग्रेजी के फेडरलिज्म (Federalism) शब्द को लैटिन भाषा के फोइडस (Foedus) से लिया गया है जिसका हिन्दी अनुवाद सन्धि अथवा समझौता है। 


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